Friday, 12 September 2014

बाढ़ के दौरान कहां हैं कश्मीर के ...




नई दिल्ली। कश्मीर में आए सैलाब में फंसे कश्मीरियों और सैलानियों को बचाने के लिए सेना के जवान जी-जान से जुटे हुए हैं। अब तक एक लाख तीस हजार लोगों को बचाया जा चुका है। लेकिन कुछ इलाकों में राहत और बचाव के लिए पहुंचे जवानों पर पत्थरबाजी की घटनाएं भी सामने आईं। सेना मदद के जरिए लोगों के गुस्से को शांत करने में जुटी है जबकि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने आशंका जताई है कि कुछ लोग इस हालात का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल ये है क्या उमर का इशारा अलगाववादियों की तरफ है?


कश्मीर घाटी में पिछले नौ दिनों से बाढ़ का कहर जारी है। पानी में घिरे लोगों को निकालने के लिए सेना, एयरफोर्स और नेवी के जवान अपनी जान पर खेलकर युद्ध स्तर पर राहत और बचाव अभियान चला रहे हैं लेकिन बावजूद इसके अब भी ऐसे कई इलाके हैं जहां पानी में फंसे लाखों लोगों की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं।


पानी घटने के बाद भी श्रीनगर के निचले हिस्सों में फंसे लोगों तक मदद नहीं पहुंच पा रही है, जिसकी वजह से इन लोगों का सरकार के खिलाफ गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में उनके सामने जो भी जवान उनके सामने पहुंच रहे हैं, वे उन्हीं पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं। गुरुवार को बटमालू इलाके में राहत अभियान चला रहे वायुसेना के हेलीकॉप्टरों पर कुछ लोगों ने छतों से पत्थर बरसाए।


हेलीकॉप्टर को निशाना बनाकर पत्थर फेंके जाने की घटना के बाद सेना के जवान फिलहाल ऐसे इलाकों में जाने से बच रहे हैं और अब वो उन इलाकों में राहत पहुंचाने में जुटे हैं जहां लोग शांत हैं और मदद की बाट जोह रहे हैं। बचाव अभियान में जुटे जवानों को उम्मीद है कि जल्द ही बाढ़ पीड़ितों का गुस्सा खत्म होगा और सेना के प्रति उनकी नाराजगी कम होगी।


जाहिर है बाढ़ में फंसे लोग जम्मू-कश्मीर सरकार के बचाव इंतजामों से बेहद नाराज हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी लोगों के गुस्से को जायज ठहराया है, लेकिन उन्होंने इस बात की आशंका जताई है कि कुछ लोग इस मौके का सियासी फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।


सवाल ये है कि जब कश्मीर में घाटी में ज्यादातर लोग बाढ़ में घिरे हैं और मदद मांग रहे हैं तो वो मुट्ठीभर कौन लोग हैं जो सेना के बचाव कार्य में अड़ंगा लगा रहे हैं? कौन हैं जो कश्मीर के इस हालात का फायदा उठाना चाहते हैं? क्या उमर का इशारा उन अलगाववादियों पर है जो इस मुश्किल घड़ी में गायब हैं?


अलगाववादियों पर उंगली उठना इसलिए भी लाजमी है क्योंकि ये नेता पहले भी कश्मीरी लोगों के एक वर्ग को सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी के लिए उकसाते रहे हैं। जाहिर है जिस तरह से सेना के जवान कश्मीर में राहत और बचाव अभियान चला रहे हैं, उससे कश्मीरी आवाम को बड़ी राहत मिली है। हर तरफ सेना के काम की तारीफ हो रही है। जबकि अलगाववादी नेताओं पर ये सवाल उठ रहे है कि इस भीषण त्रासदी में कश्मीरियों की जान बचाने के बजाए अलगाववादी नेता आखिर कहां छिप गए हैं।


महीना भर पहले दिल्ली में दिखे थे अलगाववादी


कश्मीर में आई आफत की इस घड़ी में अलगाववादी नेता भले ही नजर नही आ रहे हों, लेकिन अभी एक महीना भी नहीं हुआ जब घाटी के बड़े अलगाववादी नेता दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त से मुलाकात करते हुए दिखे थे। लेकिन कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने वाले इन नेताओं की मुलाकात पर मोदी सरकार ने सख्त रुख अपनाया और पाकिस्तान के साथ प्रस्तावित बातचीत रद्द कर दी।


शब्बीर शाह, यासीन मलिक, सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक। कश्मीर के ये चारों अलगाववादी नेता पिछले महीने दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित से मुलाकात के लिए दिल्ली में थे। वो भी तब जब भारत ने पाकिस्तान को सख्त चेतावनी दी थी कि वो अलगाववादियों से मुलाकात न करे। लेकिन कश्मीर मसले को लेकर पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने वाले ये नेता एक के बाद एक मुलाकात करते नजर आए। यही नहीं, इन सभी ने न केवल इस मुलाकात को सही ठहराया बल्कि पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तर की बातचीत बंद करने के फैसले को गलत करार दिया।


पाकिस्तान ही नहीं, इन अलगाववादी नेताओं की तरफ से भी ये दलील दी गई कि इस तरह की मुलाकातों में कुछ भी गलत नहीं और परंपरा के तौर पर ये पहले भी होती रही हैं। पहले की मुलाकातों पर नजर डालें तो नवंबर 2013 में एशिया-यूरोप बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली आए पाक पीएम नवाज शरीफ के सलाहकार ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात की थी। मई 2012 में गृह सचिव स्तर की बातचीत से पहले हुर्रियत नेता पाक उच्चायुक्त से मिले थे। जुलाई 2001 में आगरा शिखर वार्ता से पहले तत्कालीन पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ हुर्रियत नेताओं से मिले थे।


लेकिन इस बार मोदी सरकार ने पाक उच्चायुक्त की अलगावादियों से मुलाकात पर कड़ा रुख अपनाया और इसे भारत के अंदरूनी मामलों में दखल करार दिया। भारत ने पाकिस्तान की उस दलील को भी पूरी तरह से ठुकरा दिया कि कश्मीरी अलगाववादी गुट दोनों देशों के बीच कश्मीर मसले में वैधानिक पक्ष हैं।


अलगाववादी नेताओं से मुलाकात पर भारत की आपत्ति की बड़ी वजह ये है कि घाटी में सक्रिय अलगाववादी संगठन पाकिस्तान की शह पर कश्मीर को भारत से अलग करने का राग अलापते हैं। इसके लिए वो सुरक्षा बलों को बदनाम करते हैं। सरकार के खिलाफ कश्मीर बंद बुलाते हैं तो कभी पत्थरबाजी की घटनाओं को अंजाम देकर घाटी में हिंसा फैलाते हैं। ये सब इसलिए ताकि पूरे इलाके में अस्थिरता का माहौल बना रहे।


खुफिया एजेंसियों की मानें तो इन सबके पीछे पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठनों का हाथ रहता है। ये दावा तब और पुख्ता हो गया जब पिछले साल जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चेयरमैन यासीन मलिक की पाकिस्तान में हाफिज सईद के साथ मंच साझा किए जाने की तस्वीरें सामने आईं। इस्लामाबाद में यासीन मलिक 26/11 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड और लश्कर ए तैयबा के चीफ हाफिज सईद के साथ एक मंच पर बैठे थे। जब इस पर विवाद बढ़ा तो यासीन मलिक ने अपनी सफाई में कहा कि फांसी के विरोध में हम लोग शांतिपूर्ण गांधीवादी तरीके से भूख हड़ताल कर रहे थे और हाफिज को वहां बुलाया नहीं गया था, बल्कि खुद कुछ देर के लिए वह वहां पहुंचा था। सवाल ये है कि ऐसी तस्वीरें सामने आने के बाद भी क्या इन अलगाववादियों पर भरोसा किया जाए।


आज प्रश्नकाल में बात कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की जो कश्मीर में आए सैलाब की इस मुश्किल घड़ी में गायब हैं और बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने के लिए सामने नहीं आ रहे। हालांकि कश्मीरियों को कुदरत के कहर से बचाने के लिए सेना के जवान युद्ध स्तर पर जुटे हुए हैं। लेकिन आए दिन घाटी में सरकार विरोधी प्रदर्शन करने वाले अलगाववादी कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। और इसी से उठता है प्रश्नकाल का सवाल, बाढ़ के दौरान कहां है कश्मीर के अलगाववादी?


प्रश्नकाल में आज के सवाल पर हमारे साथ जुड़े पूर्व मेजर जनरल जेबी जैनी और कश्मीरी पंडित सुशील पंडित, जामिया मीलिया इस्लामिया के छात्र बशरत अली, पाकिस्तान से फोनलाइन पर रिटायर्ड एयर वाइस मार्शल आबिद राव।


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