नई दिल्ली। जम्मू कश्मीर अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ से जूझ रहा है। 7 सितंबर को झेलम का पानी बांध तोड़कर शहर में घुस गया। लोगों की मौत से जंग शुरू हो गई। इन्हीं हालात में नेटवर्क 18 संवाददाता रिफत अब्दुल्लाह ने अपनी जान की परवाह न करते हुए न सिर्फ सैलाब की तस्वीरें अपने कैमरे में कैद कीं, बल्कि कहीं से मदद न मिलते देख, वो खुद भी लोगों को बचाने के मिशन पर जुट गए। अपनी जान की परवाह न करते हुए वो झेलम की उफनती लहरों में कूद पड़े ताकि लोगों को काल का रूप ले चुकी विकराल आपदा का निवाला बनने से रोका जा सके। रिफत ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर दो सौ से ज्यादा लोगों की जान बचाने में सफलता पाई। रिफत से आईबीएनखबर के लिए बात की देव मिश्रा और अजय भारती ने। पेश हैं बातचीत के संपादित अंशः-
आईबीएनखबरः आप सालों से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आपने पहले कभी इस तरह की आपदा का सामना किया है?
जवाबः ऐसा तो मैंने पहले कभी नहीं देखा और मेरे दादा-परदादाओं ने भी नहीं देखा। 2005 में जब वहां भूकंप आया था तब भी मैं उसी एरिया में था। लेकिन वहां पर इतनी तबाही तब भी नहीं हुई थी।
आईबीएनखबरः इतनी भीषण तबाही के बीच राहत कार्य में जुटना काफी जोखिम भरा काम होता है। आपको डर नहीं लगा?
जवाबः डर नहीं लगा लेकिन कोई विकल्प भी नहीं था। कहा भी जाता है कि डर के आगे जीत है।
आईबीएनखबरः राहत कार्य के दौरान आपको सबसे बड़ी कमी किस चीज की महसूस हई?
जवाबः बस लगा कि जिन लोगों को आज तक पब्लिसिटी दी, जिन लोगों के आज तक इंटरव्यू लिए, वे मेरे काम नहीं आए।
आईबीएनखबरः बाढ़ के दौरान कई जगह आर्मी और एनडीआरएफ के लोगों को पीड़ितों के गुस्से का सामना भी करना पड़ा। क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ?
जवाबः नहीं, चूंकि हम स्थानीय थे तो हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि जो सबसे पहले राहत कार्य में जुटे वो लोकल लोग ही थे इसलिए लोकल को वहां पर कोई दिक्कत नहीं थी। वैसे, कुछ ऐसे भी लोग थे, जो ठग थे। जिन्होंने कहा कि पहले पैसा दो तब आपकी जान बचाएंगे। उनको भी हमने पकड़ा, थाने में बंद करवाया। ताकि ऐसा न हो कि कुछ लोगों को अपनी जान बचाने के लिए मजबूरन कोई चीज देनी पड़े।
आईबीएनखबरः इस आपदा में आपका परिवार भी काफी प्रभावित हुआ है, आपको ऐसा ख्याल नहीं आया कि पहले आपको उसकी हिफाजत में जुटना चाहिए?
जवाबः वो तो मेरे साथ में थे। मैंने अपनी बहन को बता रखा था कि यदि पानी में कूदना पड़े तो हाथ चलाते रहना ताकि कहीं न कहीं पहुंच जाओ। यदि कोई तार मिले, कोई दीवार मिले तो उसके सहारे चलते रहना, कोई ऊंची जगह मिले तो वहां चले जाना।
आईबीएनखबरः राज्य सरकार और उसके बाद केंद्र सरकार जिस तरह हरकत में आई तो क्या आप मानते हैं कि उनकी कोशिशें पर्याप्त थीं या फिर आपको ऐसा लगता है कि और बेहतर तरीके से राहत अभियान चलाया जा सकता था?
जवाब: देर बहुत हुई। राहत अभियान पहले शुरू किया जा सकता था। सवाल ये है कि स्टेट डिजास्टर रेस्क्यू फोर्स इतनी देर तक क्या कर रही थी? जब उनके पास एक भी नाव नहीं थी तो वह फोर्स ही किस काम की? एनडीआरएफ को भी ज्यादा संख्या में नावें लेकर ऑपरेशन चलाना चाहिए था। हमारे पास महज सात नावें थीं। वो पर्याप्त नहीं थीं। पचास नावें होतीं और उन्हें लेकर वहां काम किया जाता तो लोग भी नाराज नहीं होते। लोगों को लगता कि आज एनडीआरएफ ने हमें बचा लिया। मुझे लगता है कि वे कम संख्या में नाव और लोग लेकर आए।
आईबीएनखबरः आपको कब लगा कि अब अपना रिपोर्टिंग का काम छोड़कर आपको राहत कार्य के लिए जुट जाना चाहिए?
जवाबः जब मैंने अपनी जान बचाई, अपनी फैमिली की जान बचाई। लगा कि किसी भी ऊंची इमारत में पनाह ली जा सकती है। तो उसके बाद फौरन मुझे लगा कि जो मेरे जान-पहचान के लोग थे, उनको भी अपने साथ लेना चाहिए। मेरी पहली प्राथमिकता थी कि पहले किसी ऊंची जगह पहुंचूं। मैंने हालात देखे। कम्युनिकेशन काम नहीं कर रहा था। कैमरामैन अपना काम कर रहा था। पीटीसी मैं कभी भी रिकॉर्ड कर सकता था तो मैंने सोचा कि मुझे वापस लौटना चाहिए और कुछ नावों का इंतजाम करना चाहिए। फिर मैं झेलम के बहाव में कूदकर एक नाव खींच कर लाया और उसको काम पर लगाया। इसके बाद कुछ वुडन की बोट जिनको हम शिकारा कहते हैं, कुछ लोगों की मदद से कंधे पर लेकर आया। उनको भी काम पर लगाया। जितना भी मुझे लगा कि मैं जो कर सकता हूं, उतना किया। और उसके बाद शाम को झेलम से डल झील की ओर पानी गया। तो वहां पर बहाव में मैंने तीन बोट देखीं। लेकिन बहाव इतना था कि मैं उन तीन बोट को खोल नहीं पाया। मुझे अफसोस यह भी कि क्या सरकार उन तीन बोट को पहले से किनारे पर नहीं रख सकती थी। वो बोट वक्त पर काम नहीं आईं जबकि उन पर लिखा था ‘फायर एंड इमरजेंसी’। मुझे मायूसी हुई कि सरकार चाहती तो कुछ कर सकती थी।
आईबीएनखबरः क्या राहत और बचाव कार्य में लगी टीमों के बीच किसी तरह के समन्वय की कमी भी आपको दिखी?
जवाबः संपर्क खत्म हो गया था। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि कौन क्या काम कर रहा है और किसको क्या टास्क दें। सबसे पहले ये होता है कि एक प्रशासक होता है जो तय करता है कि कौन क्या काम करेगा। वैसा कोई सिस्टम ही नहीं था। वॉकी-टॉकी का इस्तेमाल हो सकता था क्योंकि ऐसा नहीं था कि बाढ़ एकदम से आ गई। अलर्ट तो दो दिन पहले से ही होगा। तो कम से कम उस वक्त तो कुछ कर सकते थे। अगर कहीं पहली मंजिल पर संचार सुविधा है तो उसे दूसरी मंजिल पर शिफ्ट कर सकते थे। सचिवालय छह मंजिला है तो वहां ये शिफ्टिंग हो सकती थी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सरकार किस काम की है। सरकार का काम ही है प्रबंधन और प्रशासन। मगर राज्य सरकार चीजों को ठीक से मैनेज नहीं कर पाई। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने भी त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दी। जिस दिन पीएम वहां आए उस दिन बहुत कुछ हो सकता था। हालांकि आज रिस्पांस बहुत तेज है और हर तरफ है। लेकिन पहले चार दिन ये नहीं दिखा। उस दौरान लोगों का दिल जीता जा सकता था और लोग भी कहते कि नहीं, यहां पर कोई सरकार है।
आईबीएनखबरः अस्पतालों में पहुंचे लोग राज्य सरकार के खिलाफ गुस्से में नजर आए। उनका गुस्सा किस बात को लेकर था?
जवाबः उनका ये कहना था कि जब बाढ़ आई तो सबसे पहले डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ पहले भाग गया। किसी ने ये नहीं सोचा कि मरीजों का क्या होगा। नवजात हैं, इतने छोटे बच्चे हैं इनको किनके सहारे छोड़ा है। मुझे एक महिला मिली जिसने मुझे बताया कि उसने जब कंपाउंडर से दवा के बारे में पूछा तो उसने कहा कि ये अलमारी है जिसमें दवा, ग्लूकोज है, अपने आप लगा लो। इतने बड़े अस्पताल में शुरुआती चार दिन कोई नहीं था। गर्भवती का प्रसव तो हो गया लेकिन सर्जरी हुई, टांके लगे हैं, उसकी ड्रेसिंग कौन करेगा।
आईबीएनखबरः बाढ़ में कश्मीर की बड़ी आबादी अपने ही घरों में फंसी रह गई, इसकी क्या वजह थी। क्या लोगों को अंदाजा नहीं था कि बाढ़ इतनी भीषण हो जाएगी और वे सुरक्षित स्थानों पर पहुंच जाएं?
जवाबः इतनी भीषण बाढ़ का किसी को अंदाजा नहीं था। यदि मुझे होता तो मैं भी वहां पर नहीं रहता। इतना तो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल हर कोई करता। प्राकृतिक आपदा में तो सरकार कुछ नहीं कर सकती। लेकिन झेलम के किनारे जो अतिक्रमण हो रहा था उसे तो रोक सकती थी, पानी निकलने के रास्ते बंद हो चुके थे, ये नहीं होता तो पानी को रास्ता मिलता।
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