श्रीनगर। जम्मू कश्मीर अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ से जूझ रहा है। 7 सितंबर को झेलम का पानी बांध तोड़ कर शहर में घुस गया। लोगों की मौत से जंग शुरू हो गई। इन्हीं हालात में नेटवर्क 18 संवाददाता रिफत अब्दुल्लाह ने अपनी जान की परवाह न करते हुए न सिर्फ सैलाब की तस्वीरें आप तक पहुंचाई बल्कि कहीं से मदद न मिलते देख, वो खुद भी लोगों को बचाने के मिशन पर जुट गए।
सिंतबर को जब आप लोग घरों में महफूज थे, वादी-ए-कश्मीर में सड़कों पर लहरें कर रहीं थीं मौत का तांडव। रास्ता बदल कर झेलम सारे बांध तोड़ती हुई जा घुसी थी शहर में। लहर बहा ले गई कार। सड़कों पर बह रहे थे जानवर। तिल-तिल कर डूब रहे थे घर। अपनी दुनिया लुटते देख रहे थे लाचार लोग। बेबस, अपने बच्चों को मौत के चंगुल में देख रहे थे।
क्या इंसान, क्या जानवर, क्या कारें-क्या भारी सामान, इस जलप्रलय में सब कुछ डूब-उतर रहे थे। लोग छटपटा रहे थे, चढ़ते पानी के साथ, मौत सबकुछ निगल लेने के लिए मंजिल-दर-मंजिल उपर चढ़ रही थी। सबकुछ निगाहों के सामने हो रहा था। लेकिन निगाहों में बेबसी और लाचारी के सिवा कुछ नहीं था।
हालात ये थे कि अस्पतालों में न डॉक्टर थे, न नर्सें। सैलाब के बीच जन्म ले रहे थे बच्चे। जब घाटी में लहरें कर रहीं थीं मौत का तांडव-लोग इंतजार कर रहे थे सरकार का-रेस्क्यू टीम का-ऐसा लग रहा था कि सरकार नाम की चीज है ही नहीं। कोई मददगार नहीं था-बचाने की हर गुहार लहरों से टकरा कर लौट आ रही थी।
नाउम्मीद लोगों ने, बेबस लोगों ने, आखिरकार खुद उठा ली पतवार। वो खुद बन गए अपने मसीहा। ऐसे लम्हे में नेटवर्क 18 रिपोर्टर रिफत अब्दुल्लाह पत्रकारिता का फर्ज निभाते हुए इंसानियत के मोर्चे पर डट गए। वो खुद निकल बड़े वॉलंटियर्स के साथ लोगों को बचाने के मिशन पर।
ईटीवी रिपोर्टर रिफत अब्दुल्लाह करीब तीन दिन तक सैलाब में फंसे रहे। वो सारा मंजर कैमरे पर रिकॉर्ड करते रहे। जान की परवाह न करते हुए लोगों को बचाते रहे। उन्होंने 200 से ज्यादा लोगों की जान बचाई। इस दौरान वो नेटवर्क 18 हेडक्वार्टर से भी संपर्क करने की कोशिश करते रहे। आखिरकार, 3 दिन बाद जब वो सैलाब से बाहर निकल पाए तब जाकर बेखौफ और समर्पित पत्रकारिता की मिसाल बन गईं ये तस्वीरें दुनिया के सामने आ सकीं।
7 सितंबर की सैलाब में रिफत और उनका परिवार भी फंसा हुआ था। एक तरफ फर्ज था, दूसरी तरफ परिवार। रिफत ने दोनों जिम्मेदारियां पूरीं की। इसी मौके पर उन्होंने उन परिवारों को देखा जो जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। यहीं पर रिफत ने फैसला किया कि वो पत्रकारिता और इंसानियत दोनों का फर्ज निभाएंगे।
8 सितंबर को श्रीनगर के राजबाग इलाके में मौजूद नेटवर्क 18 रिपोर्टर रिफत अब्दुल्लाह ने तबाही का जो मंजर देखा वो अब इन तस्वीरों के जरिए सामने आ रहा है। रिफत तीन दिन से ऐसे इलाके में फंसे थे जहां से निकलना लगभग नामुमकिन था। लेकिन अब वो तस्वीरें आपके सामने हैं जो बता रहीं हैं कि कितना खौफनाक था वो मंजर। कारें बह गईं, जानवर बह गए, सामान
रिफत अब्दुल्लाह उस रॉफ्ट के जरिए अपने मकान की ऊपरी मंजिल से बाहर निकले। उनके परिवार के लोग भी इसी राफ्ट के जरिए बचाए गए। पानी का बहाव इतना ज्यादा था कि कुछ देर पहले तीन मंजिला नजर आ रहा मकान अब सिर्फ दो मंजिला ही रह गया था।
दूसरी तरफ, सरकारी मशीनरी से मदद न मिल पाने से लोग परेशान थे। उन्होंने खुद ही अपनी मदद करने का फैसला किया। रिफत अब्दुल्लाह भी हाथ पर हाथ रखे हुए नहीं बैठ सके। पत्रकार का फर्ज एक तरफ था लेकिन वक्त का तकाजा था कि लोगों की जान बचाई जाए।
एक रस्सी लगा कर लोगों को सड़क की दूसरी तरफ सुरक्षित जगह पहुंचाया जाने लगा। रिफत, खुद बच्चे और बुजुर्गों को अपनी पीठ पर लाद कर दूसरी तरफ पहुंचाने लगे। सरकार से नावें न मिलने की वजह से लोगों ने अब कश्तियों को निकालना शुरू कर दिया था। रिफत भी कश्ती को सैलाब के पानी में ले गए।
कुछ नावों के हाथ में आते ही बहुत से वॉलंटियर्स अब श्रीनगर में जगह-जगह लोगों को बचाने के लिए निकल पड़े थे। रिफत अब्दुल्लाह भी चल पड़े पत्रकारिता और इंसानियत का फर्ज निभाने। जान की परवाह किए बगैर, दूसरे वालंटियर्स के साथ घरों की छतों पर चलते हुए रिफत उस अस्पताल तक पहुंचे जहां बहुत से लोगों के फंसे होने की खबर आ रही थी। सैलाब का खौफनाक मंजर और नदारत सरकार। अब लोगों के गुस्से का ठिकाना नहीं था, लेकिन रिफत और वॉलंटियर्स फर्ज की डगर पर मुस्तैद थे।
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