नई दिल्ली। जम्मू कश्मीर में जैसी जल प्रलय आई, वैसी पिछले 60 साल में किसी ने भी नहीं देखी। गांव के गांव तबाह हो गए। सड़कें टूट गईं, शहर पानी में डूब गए। बाढ़ में लाखों लोग फंस गए। इन हालात में तीनों सेनाओं ने देश के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा राहत और बचाव अभियान शुरू किया।
ये ऑपरेशन जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। हेलीकॉप्टर को हवा में पीड़ित के ऊपर बिल्कुल स्थिर रखना होता है।रस्सी के जरिए आम लोगों को बिल्कुल सीधे खींचना होता है। तेज धारा में, मलबे के बीच, नदी-नालों और शहर की गलियों से छोटी बोट के जरिए लोगों को बचाना एक मुश्किल मिशन है। लेकिन जवान हर दम मुस्तैद रहते हैं।
उफनती नदी के दो किनारों पर रस्सी बांध कर लोगों को सुरक्षित जगह ले जाना आसान नहीं है। जरा सी चूक का मतलब है कि नातजुर्बेकार पीड़ितों की मौत। मगर, जब प्रशिक्षित जवानों की निगरानी में ऑपरेशन होता है तो वो मिसाल बन जाता है।
तेज हवाओं के बीच हेलीकॉप्टरों को उतारने का कमाल सेना और वायुसेना के जांबाज पायलट ही कर सकते हैं। पुंछ के एक इलाके में सड़क पूरी तरह से टूट गई थी, लेकिन सेना के इंजीनियरों ने देखते ही देखते पुल तैयार कर दिया। पहाड़ काट कर रास्ता बनना कोई भारतीय सेना से सीखे।
80 मेडिकल टीम, 4 फील्ड अस्पताल, 22500 से ज्यादा लोगों का इलाज-ये सेना का ही कमाल है। जम्मू-कश्मीर में फंसे हजारों सैलानियों को भी सेना ने निकाला है, जो उन्हें भूल नहीं पा रहे हैं। जी हां, तीनों सेनाओं का ये अभियान भुलाया नहीं जा सकता है। हजारों जवान 12 दिन से लोगों को बचाने में जुटे हैं, ऐसे जवानों को देश कर रहा है सलाम। इसी पर खास पेशकश, जय जवान!
जम्मू-कश्मीर में राहत कार्य में लगे जवानों के सामने हालात बहुत मुश्किल हैं। उन्हें न सिर्फ मौसम और बाढ़ से जूझना पड़ रहा है, बल्कि राज्य सरकार की नाकामी से उप्रुो असंतोष और गुस्से का निशाना भी वही बन रहे हैं। इन हालात में कितना मुश्किल है राहत और बचाव ऑपरेशन, आईए देखते हैं...
देश की सेनाओं को आमतौर पर युद्ध क्षेत्र में लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। राहत और बचाव कार्य के लिए देश में अलग से प्रशिक्षित National Disaster Response Force है, मगर चुनौती जब जम्मू-कश्मीर जैसी बाढ़ की हो तो NDRF के मुट्ठी भर जवानों के सहारे नहीं रहा जा सकता है। ऐसे मौके पर सेना ही संकटमोचक की भूमिका में सामने आती है।
लोगों के बचाने के लिए चल रहे राहत कार्य में सेना के संकल्प को समूचा देश सलाम कर रहा है। इस शानदार राहत कार्य में तीनों सेनाओं और NDRF ने मिल कर 13 सितंबर की सुबह तक 1, 42, 000 लोगों को बचाया है। सेना की 224 और NDRF की 148 नावें बचाव कार्य में जुटी हैं। बाढ़ पीड़ितों को 8,200 कंबल और 1119 टेंट बांटे हैं। सेना की 15 इंजीनियर टॉस्क फोर्स जम्मू-कश्मीर में हैं। 4 फील्ड अस्पतालों के जरिए 80 मेडिकल टीम आपदा क्षेत्र में हैं। सेनाओं ने 22,500 मरीजों का इलाज किया है। 11 सितंबर तक एयर फोर्स ने 930 उड़ानें भरी थीं।
वायुसेना के 31 विमान और 30 हेलीकॉप्टर राहत कार्य में लगे हैं। 11 सितंबर तक सेना के हेलीकॉप्टरों ने 120 उड़ानें भरीं। सेना ने दुनिया के सबसे बड़े हेलीकॉप्टर MI-26 को भी मिशन पर लगाया है। नौसेना के मार्कोस कमांडो भी लोगों को बचाने में लगे हैं।
तीनों सेनाओं ने जिस तरह से जम्मू कश्मीर के लोगों को बचाने के लक्ष्य को चुनौती की तरह लिया है-वो अभूतपूर्व है। माना जा रहा है कि जम्मू कश्मीर में चल रहा राहत और बचाव ऑपरेशन उत्तराखंड में चलाए गए राहत कार्य से भी ज्यादा विराट और सघन है।
जम्मू कश्मीर की जल प्रलय में सेना ने अपने संपूर्ण क्षमताओं का प्रदर्शन किया है। मोबाइल सेवा बहाल करने जैसे मिशन भी सेना अंजाम दे रही है। जबकि सच ये है कि सेना हो, वायुसेना हो या नौ सेना, राहत और बचाव ऑपरेशन करना उनका काम नहीं है। उन्हें देश की रक्षा की ट्रेनिंग मिली है। लेकिन देश जब संकट में होता है तो जवान ट्रेनिंग से ऊपर उठ कर जांबाजी दिखाते हैं।
डेढ़ साल में दो बड़ी त्रासदी
करीब डेढ़ साल के भीतर देश ने दो बड़ी त्रासदी देखी है, साल 2013 को उत्तराखंड में त्रासदी आई-अब जम्मू-कश्मीर में 60 साल की सबसे बड़ी बाढ़ आई है। दोनों ही जगह सेनाओं ने अपने शानदार राहत और बचाव कार्य से लोगों का दिल जीत लिया।
देश पर कैसा भी संकट आ जाए-तीनों सेनाओं के जवान हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार रहते हैं। कश्मीर में सेना करीब डेढ़ लाख लोगों को बचा चुकी है। उत्तराखंड में सेनाओं ने करीब सवा लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित जगह तक पहुंचाया था। तीनों सेनाओं के सामने एक बार फिर वैसी ही चुनौती है, लेकिन हालात में फर्क भी है, लिहाजा राहत दल सिर्फ पुराने तजुर्बे पर ही भरोसा नहीं कर रहे।
राहत दल के सामने बारिश और बादल के अलावा भी कई तरह की चुनौतियां होती हैं, जिनका ख्याल रखते हुए ऑपरेशन को अंजाम देने पड़ता है। हर कुदरती आपदा की अपनी चुनौती होती है और समस्याओं के अपने हल होते हैं। जम्मू-कश्मीर में इस वक्त मुख्य समस्या जल स्तर है, जिधर नजर जाती है, पानी डूबे हुए शहर नजर आते हैं।
उत्तराखंड में जब बादल फटा तब पहाड़ों का गिरना, सड़कों का टूट जाना ज्यादा बड़ी आफत थी। ऐसे मौके पर पीड़तों तक पहुंचने के लिए वायुसेना ने धरासू की छोटी सी एयरस्ट्रिप पर C-130J हर्क्यूलिस जैसे विशाल विमान को उतारने का कमाल दिखाया था। हर्क्यूलिस से लिए गए फ्यूल से ही हेलीकॉप्टर धरासू के बेस से शानदार राहत कार्य चला सके थे। बड़े और हल्के हेलीकॉप्टरों के जरिए पायलटों ने ऐसी जगहों पर भी उन्हें उतारा था, जहां उतरना नामुमकिन ही था।
सेना ने भी जगह-जगह रस्सी के बर्मा पुल बना कर हजारों लोगों की जान बचाई थी। कुछ ऐसे ही शानदार तरीके इस बार भी अपनाए जा रहे हैं। बाढ़ में सड़क के कट जाने से पुंछ की कृष्णा घाटी में कुछ गांव पूरी तरह से कट गए हैं। अब सेना यहां पर पहाड़ काट कर रास्ता बना रही है।
हालांकि ऐसे मुश्किल ऑपरेशनों में सेना को कई बार बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है। 25 जून 2013 को Mi-17 V5 हेलीकॉप्टर गौरीकुंड में क्रैश हो गया था। हादसे में एयरफोर्स, एनडीआरएफ और आईटीबीपी के कुल 20 जवान मारे गए थे। ऐसे हादसों के बावजूद भी जवान फर्ज की राह पर मुस्तैद रहते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि ये हैं तभी हम हैं, फिर बात चाहे सरहद पर दुश्मन की चुनौती की हो-या कुदरती आपदा की। देखें वीडियो।
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