Monday, 1 September 2014

शरीफ ने बुलाया संसद का सत्र, आर्मी ...




इस्लामाबाद। पाकिस्तान में सियासी हालात बद से बदतर हो गए हैं। तहरीक ए इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान और धर्मगुरु ताहिर उल कादरी की अगुवाई में यहां तीन हफ्ते से चल रहे प्रदर्शन ने गंभीर रूप धारण कर लिया है। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का इस्तीफा मांग रहे हैं लेकिन शरीफ ने मंगलवार को संसद का विशेष सत्र बुला लिया है। इस संयुक्त सत्र में ताहिर उल कादरी की पार्टी अवामी तहरीक को बैन करने और आर्मी चीफ से इस्तीफा मांगने का प्रस्ताव लाया जाएगा। पाक सुप्रीम कोर्ट ने सभी जजों की छुट्टियां रद्द कर उन्हें तुरंत इस्लामाबाद बुला लिया है। सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने मौजूदा हालात के मद्देनजर प्रधानमंत्री शरीफ से मुलाकात की।


इससे पहले पाकिस्तान की सेना ने सोमवार को पाकिस्तान टेलीविजन चैनल के दफ्तर में घुसे प्रदर्शनकारियों को बाहर खदेड़ उसकी सुरक्षा चाक-चौबंद कर दी। प्रदर्शनकारियों के घुसने से इस्लामाबाद में चैनल का प्रसारण बाधित हो गया था। समाचार पत्र 'डॉन' की वेबसाइट के अनुसार, पीटीवी के अधिकारियों ने कहा कि चैनल का प्रसारण बहाल कर दिया गया है।


पीटीवी ने ट्वीट में लिखा कि पीटीवी वर्ल्ड और न्यूज का प्रसारण फिर से शुरू कर दिया गया है। पीटीवी के प्रबंध निदेशक मोहम्मद मलिक ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने टेलीविजन के मुख्यालय से लाखों रुपये के कैमरे चुरा लिए और दफ्तर के अंदर केबल को भी नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की प्रवक्ता शीरन मजारी ने कहा कि चैनल के दफ्तर पर हमले की घटना अस्वीकार्य है। हमले में शामिल लोगों को सजा मिलनी चाहिए।


उधर, पीटीआई नेता इमरान खान ने कहा कि पीटीआई समर्थक पीटीवी की इमारत में नहीं घुसे थे। उन्होंने कहा कि अगर पीटीआई समर्थक इमारत के अंदर मिलते हैं, तो उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया जाएगा। इमरान ने कहा कि मैं प्रदर्शनकारियों से क्षेत्र के अंदर कोई भी हिंसक गतिविधि और उन कृत्यों को करने से बचने की अपील करता हूं, जिनसे पार्टी की बदनामी हो।


इमरान-कादरी की क्या हैं मांगें


इमरान खान और ताहिर उल कादरी की मांगों की लंबी फेहरिस्त है। नवाज के लिए इन्हें मानना तकरीबन नामुमकिन है। इनकी मांग है कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ इस्तीफा दें। पाकिस्तान में नए सिरे से चुनाव कराए जाएं। सभी विधानसभाओं के लिए दोबारा चुनाव हों। सभी सियासों दलों की सलाह से निष्पक्ष नागरिक सरकार बने। सभी चुनाव कमिश्नरों से इस्तीफे लिए जाएं और चुनाव सुधार हों। 2013 के चुनाव में 'धांधली' में शामिल लोगों पर मुकद्दमा चले।


सेना की भूमिका पर भी है संदेह


पाकिस्तानी सेना इस मामले में फिलहाल ज्यादा खुलकर सामने नहीं आ रही है, लेकिन ताजा हालात देखते हुए सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने अपने खासमखास अफसरों के साथ बैठक की। इसके बाद उन्होंने नवाज शरीफ से भी मुलाकात की। इससे पहले सेना ने बयान जारी कर नेताओं को संयम बरतने की सलाह भी दी थी।


कई लोग ऐसा मानते हैं कि सेना जब तक नवाज के साथ है, उन्हें कोई खतरा नहीं है, लेकिन कई ऐसे लोग भी हैं जिनका मानना है कि असल में पाकिस्तानी सेना इमरान और कादरी के साथ है। उन्हें आगे बढ़ाकर सेना एक बार फिर पाकिस्तान की सत्ता हथियाना चाहती है। जैसे-जैसे हालात बिगड़ेंगे सेना शासन-प्रशासन पर कब्जा करती जाएगी। फिलहाल तो प्रधानमंत्री नवाज लाहौर में हैं, लेकिन इस्लामाबाद में बढ़ी हिंसा पूरे देश में फैलने का खतरा है। शायद तब लाहौर में बैठै नवाज एक बार फिर सेना की धमक की आंच महसूस करें।


इमरान-कादरी को क्यों बढ़ा समर्थन


पाकिस्तान में भूख है, गरीबी है, बेरोजगारी है, आंतरिक आतंकवाद है, अलग-अलग फिरकों के बीच आपसी जंग है, अपराध है, और खस्ताहाल अर्थव्यवस्था है। पाकिस्तान की जनता ऐसे हालात में बदलाव चाहती है। पीटीआई के अध्यक्ष इमरान खान और पाकिस्तान अवामी तहरीक के मुखिया ताहिर उल कादरी ने लोगों को इस बदलाव के सपने दिखाए तो लोग उनके साथ हो लिए। हालांकि 18 दिन पहले जब उनके साथ प्रदर्शनकारी इस्लामाबाद के रेड जोन में पहुंचे तो उनकी संख्या ज्यादा नहीं थी। तकरीबन साठ हजार लोगों की तादात बताई जा रही थी, लेकिन इसमें बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं भी शामिल थे। इन्हें उम्मीद थी कि उनका आंदोलन पाकिस्तान में वो क्रांति ले आएगा, जिसका इंतजार उसे लंबे वक्त से है।


मगर, सवाल ये भी है कि पुराने सियासी नेताओं और पुरानी सियासी पार्टियों को छोड़कर लोगों ने दो ऐसे नेताओं की अगुवाई में जुटना क्यों पसंद किया जो बुनियादी रूप से नेता नहीं थे। इमरान खान पूर्व क्रिकेट स्टार हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को विश्वकप जितवाया था। 1997 में उन्होंने अपनी सियासी पार्टी बनाई लेकिन जनसमर्थन उन्हें अब जा कर हासिल हुआ है। 2013 के चुनाव में वोट शेयर के मामले में उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर थी, हालांकि सीटों के मामले पर वो तीसरे नंबर पर आई। खैबर पख्तूनख्वा में इमरान की पार्टी सरकार बनाने में भी कामयाब रही।


वहीं सूफी मौलाना ताहिर-उल-कादरी भी पाकिस्तान में स्थापित सियासी नेता नहीं हैं। जनरल जिया उल हक के निधन के बाद ताहिर उल कादरी ने सियासत में कदम रखा था लेकिन इसके बाद वो कनाडा में जा बसे। बीच-बीच में पाकिस्तान आते रहते हैं। चुनावों में उनकी पार्टी पाकिस्तान आवामी तहरीक नाकाम ही रही है लेकिन 1981 में स्थापित कल्याणकारी संस्थाओं के जरिए उन्होंने अच्छा जनसमर्थन जुटा लिया।


इस जनसमर्थन की बदौलत ही ताहिर-उल-कादरी ने पिछले साल भी समर्थकों की लंबी चौड़ी फौज के साथ इस्लामाबाद का घेराव किया था, लेकिन चुनाव सुधार और सियासी पारदर्शिता की शर्तों पर हुए एक समझौते के बाद उन्होंने घेराव खत्म कर दिया था। हालांकि ये मानने वालों की भी कमी नहीं है कि 2013 में कादरी के लॉन्ग मार्च के पीछे सेना का मूक समर्थन था जो तत्कालीन सरकार का असर कम करना चाहती थी। तो क्या इस बार भी बदलाव के इस सपने को सेना ने ही हवा दी है, ताकि वो लोकतंत्र की जड़ों को एक बार फिर कमजोर कर सके।


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